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बात वर्ष १९६९ के उन दिनों कि है जब मैं हायर सेकेंडरी की परीक्षा पास कर इंजीनियर कालेज में दाखिले का इंतजार कर रहा था ! मेरा नाम चूंकि प्रतीक्षा सूची में था, अतः मैं कुछ दिनों के लिए मोतिहारी जाकर एम. एस. कॉलेज में क्लास करने लगा ! मैं अपने मामू प्रो अरुण कुमार सिन्हा के यहाँ ही रहकर क्लास कर रहा था और इस दरमियान मुझे उनका दो – तीन अंग्रेजी का क्लास करने का अवसर प्राप्त हुआ मुझे उनकी बुलंद आवाज जो कि क्लास के आखिरी बेंच तक सुनाई देती थी, अभी भी मेरे कानों में गूंज जाती है ! छे वर्ष बाद जब मेरे पापा का ट्रान्सफर मुजफ्फरपुर हो गया तो मैं मकान खोजने के सिलसिले में हमेशा उनके संपर्क में रहा, चूँकि अब वे मोतिहारी से मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज में स्थानांतरित हो गए थे. किस्मत से मुझे मकान भी उनके घर के समीप में मिल गया ! तब शुरू हुआ उनसे दोस्ती का सिलसिला– दोस्ती इसलिए कि अक्सर होली के मौके पर हमलोग एक दूसरे के दोस्त के यहाँ जाते थे और उनका कहा हुआ यह वाक्य के “घर में नहीं खाओ तो अंत तक खाते रहोगे” हमेशा मुझे होली में उनकी याद ताजा कर देता है !

उनका यह कथन कि ‘ देवानंद की फ़िल्म देखने के बाद मैं अपने आपको दस साल छोटा समझने लगता हूँ ‘ बरबस मेरे चेहरे पर मुस्कान ला देती है ! मुझे याद है कि तब १९७७ का चुनाव आ चुका था, और प्रो. सिन्हा जॉर्ज फर्नान्डिस के निकटतम राजनितिक कर्मियों में से एक थे. उनके पोस्टर को दिवार पर चिपकाने के लिए रात रात भर जागरण करना पड़ता था ! उनका सन्देश आम लोगों तक पहुँचाने के लिए उन्ही के कथनानुसार बस स्टैंड, रेलवे का प्रतिक्षारूम, कुछ ख़ास चौराहा, जहाँ आम आदमी की बहुतायत  होती है, बांटा करता था !

एक और घटना मुझे याद आ रही है, उस समय मेरी बहन की शादी मुजफ्फरपुर में ही तय हो गयी थी ! रोशनी बाजे का इंतजाम मेरे जिम्मे था ! हमलोग उस समय के मशहूर मच्छन बेंड के पास गये थे !प्रोफ. सिन्हा का विनोदपूर्ण मिज़ाज़ था और उनकी बात-चित से ही प्रभावित होकर उस बेंड मास्टर ने ५०००/- कि जगह सिर्फ ५००/- में ही बंद देने की हामी भर दी. एक और वाक्या है.  जब मैं पटना में था और मेरी छोटी बहन की शादी की बात मुजफ्फरपुर में चल रही थी ! उस समय बहन को दिखाने के लिए एक करीबी रिश्तेदार की लाल बत्ती वाली गाडी मुझे मिल गयी थी.  उस समय उन्होंने मुझे कहा था कि अगर लड़के वाले तुम्हारे गाडी में बैठ गये तो समझो कि पहला सेट तुमने जीत लिया ! उनका यह कहना बिलकुल सच साबित हुआ ! लड़के वाले ने गाडी में बैठने से इंकार कर दिया और शादी वहाँ तय नहीं हो पायी.

यह इसे संयोग ही कहिये कि हमलोग ने पटना में अपना गृह – प्रवेश एक ही दिन रखा ! इन्होने समस्या का हल भी ढूंढ लिया ! दिन का खाना अपने यहाँ रखा एवं रात का खाना मेरे यहाँ तय हुआ ! सन २००८ में मेरा जब ट्रान्सफर दिल्ली हुआ और मुझे द्वारिका में रहने का सुअवसर प्राप्त हुआ तो फिर करीब होने एंव मुलाकातों का सिलसिला चल पड़ा ! जिस दिन मैं अपना किराए का मकान फाइनल कर रहा था, उस दिन से लेकर आर. के . पुरम. में क्वार्टर में रहने तक कई बातें हैं जिन्हें मैं कुछ शेयर करना चाहता हूँ ! छठ के समय घात का चुनाव हमेशा उन्हें तनाव में रखता था.

और अंत में उनकी अंतिम इच्छा जो थी हरिद्वार, ऋषिकेश जाने की, उसमे उनका साथ मेरे लिए अविश्वनीय है ! चाहे छोटी वाले के यहाँ खाना हो या गंगा स्नान या गंगा की आरती सभी में हमलोग साथ साथ रहे ! उनके चेहरे पर जो मैंने संतोष की झलक देखी वह हमेशा मुझे याद रहेगा ! नियती का भी कैसा विधान है जिस गंगा जल को उन्होंने हर की पौड़ी पर लिया वहीँ गंगा जल उनकी मुक्ति के वक़्त उपयोग में आया. ! विशवास ही नहीं होता है कि जो अपने अंतिम रात में दोस्तों के साथ भावी योजनाओं को अमल में लाने की बाद करता है वो चंद घंटों के बाद बिना किसी को आवाज दिए उस यात्रा पर निकल जाता है जहां से लौट कर कोई नहीं आया ! सिर्फ आती है उनकी यादें ! यादें ना जाए उनके साथ बिताये पलों कि, दिल क्यों रुलाये ! यह सिलसिला अभी ख़त्म नहीं हुआ है, पता नहीं कहाँ ख़त्म होगा ! शायद अंतिम क्षणो तक यह साथ रहेगा !

सितम्बर, २०१३

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अमल कुमार सिन्हा

श्री अमल कुमार सिन्हा केंद्रीय जल आयोग, नयी दिल्ली से हाल ही में वरिष्ठ अधीक्षक अभियंता के पद से सेवा-निवृत हुए हैं

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