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सन् १९७९ और १९८१ के बीच AKS ने सम-सामियिक चिंतन की तीन  पत्रिकाएं–‘चिन्गाङी’, ‘युवा-जागरण’ एवं ‘समाधान’,–अपने सहयोगियों और विद्यार्थियों के एक प्रतिबद्ध टीम के साथ मुजफ्फरपुर, बिहार से प्रकाशित किया. इन पत्रिकाओं के ‘संपादक’ रोटेशनल बेसिस पर इनके विद्यार्थी, जो कि उस वक्त बिहार विश्वविदालय में मुख्यतः स्कोनातकोत्तर के छात्र थे, हुआ करते थे और AKS का नाम ‘संरक्षक’ के रूप में जाता था. इन राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक पत्रिकाओं के कुछ अंक अभी भी उप्लब्ध है और उनपर अलग से विस्तृत समीक्षा प्रकाशित की जाएगी, लेकिन यहाँ हम प्रस्तुत कर रहें कुछ-एक फिल्म समीक्षाएं जो की AKS ने खुद लिखी थीं. हालाँकि, चूंकि इन पत्रिकायों की कई सामाग्रियां AKS खुद हीं तैयार करते थे, इसीलिए शायद इन फिल्म समीक्षाओं में उन्होंने अपना नाम नहीं दिया करते थे.  आज प्रस्तुत है फिल्म, ‘चक्र’ की समीक्षा. ‘चक्र’ १९८१ ई. में रिलीज़ हुयी थी, और इसकी समीक्षा ‘समाधान’ के प्रवेशांक ‘मई १९८२’ में प्रकाशित हुयी. संभव है की उस समय बन रही कला फ़िल्में अलग-अलग शहरों में अलग-अलग समय में रिलीज़ होती हों. यहाँ दिए हुए फिल्म का पोस्टर इन्टरनेट से लिया गया है और ‘समाधान’ के फिल्म समीक्षा में यह शामिल नहीं था. यह उल्लेख्नीय है कि इन पत्रिकाओं को बेचने के लिए AKS अपने विद्यार्थियों के साथ शहर के मुख्य बाज़ार, रेलवे स्टेशन, कॉलेज एवं विश्विद्यालय परिसर आदि में खुद जाते थे. आश्चर्य की बात है की, ३० से भी ज्यादा वर्षों के बाद भी यह फिल्म, और शायद इसकी यह समीक्षा भी, आज उतनी ही प्रासंगिक लग रही है. –AKSCENTRE        

फिल्म
क्या पानी ऊपर आएगा?
आदमी को भरोसे के माँ-बाप, भरोसे का समाज मिल जाए और काम लायक दिल और दिमाग भी लेकर वह पैदा हुआ हो, तो वह कहावती तारे भी तोड़ ला सकता है. इन तीनों (माँ-बाप, समाज, तथा दिलो-दिमाग) में से कोई दो तो बेहद ज़रूरी है, आदमी को पशु या पदार्थ के स्तर ऊपर उठने के लिए.
हिंदी फिल्म ‘चक्र’ में जब आदमी कोशिश करता है झुग्गी-झोपङियों की देह और आत्मा विहीन जिंदगी (?) से ऊपर उठने की, तो वह या तो गेहूं की लूट में ट्रक के नीचे आ जाता है या, लूका की तरह, अवैध शराब बनाते हुए और हर वैसी औरत के साथ सम्बन्ध रखते हुए चर्म रोग से ग्रस्त हो जाता है, तथा अपना ही मांस कट-कट कर गिरता हुआ देखता है.
लूका (नसीरुद्दीन शाह) के माँ-बाप का पता दर्शक को नहीं दिया जाता है. शायद निर्देशक संकेत से यह बतलाना चाहते हों कि उन्ही के माँ-बाप का पता दिया जाता है, जिनका अपना कुछ पता हो. दो-तीन साल बाद (जिसमे एक-दो बार वह जेल भी काट आया है) लूका अपनी पुरानी झुग्गी-झोपडी में लौटता है. यह झोपड़ियां क्या हैं, ठहरे पानी का एक बड़ा गड्ढा है, जिसमे मछलियाँ इस तरह से सड़ती हैं कि जैसे उनके सड़ने मात्र से सृष्टि का कोई उद्देश्य पूरा हो रहा है.
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इस ठहरे पानी के तालाब में एक ऐसी मछली (स्मिता पाटिल) है, जिसने मन के स्तर पर सङना तो शुरू कर दिया है, पर जो जिस्म के स्तर पर पूरा जोखम भरी है. इस जिस्म्वती महिला को एक पंद्रह-साल का पुत्र भी है, जिसे अभी तक यह नहीं मालूम हो सका है की उसे हाथ-पाओं किस लिए मिले हैं. लूका उसकी माँ का पुराना दोस्त है, पर अभी तक उसको यह नहीं मालूम है कि दोस्त के कितने मायने होते हैं…लेकिन दो-तीन दिनों में लूका उसको सब कुछ सीखा देगा. और जो सीखने को बाकी रह जाएगा, वह ट्रक-ड्राईवर (कुलभूषण खरबंदा) से सीख लेगा, जिसकी हर लम्बी सफ़र का अंत उसकी माँ के पहलू में होता है.
 फिल्म ‘चक्र’ को सराहना आसान नहीं है, क्योंकि यह मनोरंजन प्रदान करने के बहाने हमारे तथाकथित सभ्य समाज का पदाॅफाश कर देती है. बम्बई महानगर में स्थित इन झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले औरत-मर्द ऐसे तो सभ्य भाषा में  पति-पत्नी, या माँ-बेटे कहे जाऐंगे, (क्योंकि एक के मरने पर दूसरा रोता या दूसरी रोती है) पर दरअसल, वे इस व्यवस्था के अनिवार्य और अंतिम शिकार हैं.
 ‘चक्र’ के आखिरी दृश्यों में ट्रक-ड्राईवर भी, जो इस ठहरे हुए पानी का निवासी नहीं लगता था, अपने ट्रक से हाथ धो लेता है, झोपङियाँ प्रस्तावित पांच-सितारिया होटल के निर्माण के लिए ध्वस्त कर दी जाती हैं, मन और अब शरीर से भी रोग-ग्रस्त मछली सोचती हुयी दिखाई देती है कि क्या धरती के नीचे का पानी कभी फूट कर ऊपर आयेगा भी या …?
 –”समाधान’, [सामायिक चिंतन का लोकप्रिय प्रतिनिधि; आर्थिक समानता, सामाजिक न्याय एवं स्वस्थ शिक्षा के लिए प्रतिबद्ध], प्रवेशांक ‘मई १९८२’, मुजफ्फरपुर, बिहार