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बात 1980 की है जब असम व पंजाब के छात्र-नौजवान अपनी-अपनी मांगों को लेकर तोड़-फोड़ वाला आंदोलन कर रहे थे। श्रीलंका का लिटटे भी भारत में कई तरह की आतंकी गतिविधियों में संलिप्त था। इसके विरोध् में देश के विभिन्न राज्यों में प्रगतिशील और गांधी विचारधारा के छात्र, नौजवान, शिक्षक व संगठन संगोष्ठी, प्रदर्शन आदि कर रहे थे। इसी क्रम में लंगट सिंह कालेज, मुजफ्फरपुर में अँगे्रजी विभाग के वरिष्ट प्राèयापक प्रो0 अरूण कुमार सिन्हा के नेतृत्व में समाज के प्रबुध्ह जन कथित हिंसावादी आंदोलन का विरोध कर रहे थे। प्राध्यापगण, वकील व सामाजिक कार्यकर्ता इसमें सिरकत कर रहे थे।

इसी बीच सितम्बर का महीना आया। राजदेव नारायण अधिवक्ता के निवास पर बैठक हो रही थी। प्रो0 अरूण कुमार सिन्हा ने अपने संभाषण में एक सुझाव दिया कि वर्ष में कम से कम एक दिन हमलोगों को खुद आत्म शुध्दि या आत्म मंथन अथवा आत्म संयम दिवस के रूप में मनाना चाहिए। ताकि हमें स्वयं को संयमित होकर आंदोलन करने का बल मिले। जैसा कि हमसबों ने महसूस किया है कि आंदोलनरत रहते हुए कभी-कभी हम इनकी मर्यादाओं को तोड़ने लगते है। ऐसी हरकत करने में छात्र आगे होते है। उनकी उम्र ही ऐसी है कि वे शीघ्र उत्तेजित हो जाते है। हमारे इस ‘आत्म संयम’ के निर्णय से हमसे अधिक छात्रों को लाभ होगा। क्योंकि उन्हें लम्बे समय तक सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहना है। उनका संयम आंदोलनों को सफलता दिलाएगी और अहिंसा की नीति अपनाने वाला यह देश सम्पूर्ण विश्व के लिए प्रेरक बनेगा।

प्रो0 सिन्हा के इस प्रस्ताव ने  पूरे सदन को गंभीर कर दिया। कुछ देर तो सभी चुप रहे लेकिन अचानक ही सबों ने इस प्रस्ताव पर अपनी सहमति दी। विमशोपरांत 2 अक्टूबर को ‘आत्म संयम या ‘आत्म मंथन  के लिए निधारित किया गया । प्रो0 सिन्हा ने इस दिन को मौन व्रत रखने की धोषणा की। इस प्रस्ताव के दिन सभी उपस्थित व्यकितयों ने 2 अक्टूबर को उपवास रखा और शाम को पुन: राजदेव नारायण के निवास पर एकत्रित होकर गांधी विचारों पर चर्चा की और सामूहिक रूप से नीबू पानी पी कर उपवास तोड़ा।

बाद के दिनों में यह तदर्थ समिति भंग हो गई लेकिन मैं प्रो0 सिन्हा के साथ वर्ष 2011 तक नियमित रूप से 2 अक्टूबर को उपवास रखता रहा। मैं जहां कही भी होता था प्रो0 सिन्हा से बात जरूर करता था और याद दिलाता था कि ‘सर आज 2 अक्टूबर अर्थात ‘गांधी जयन्ती है और मैं उपवास पर हूँ।’ जबाब में वे भी कहते थे कि मैं भी उपवास पर हूँ। यह क्रम जारी रहना चाहिए। वेशक यह क्रम आज भी जारी है लेकिन अब अकेला रह गया हूँ। 2 अक्टूबर को प्रो0 अरूण कुमार सिन्हा की बड़ी याद आती है, कुछेक बूंद आंसू भी निकल जाते है।

बस अभी इतना ही……………………

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डा0 विनय कमार दास
असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीती विभाग 
जे ऍम प डी अल महिला महाविद्यालय
मधुबनी, बिहार
एवं
सचिव, ‘समाधान’, कामेश्वरी निवास
विनोदानंद कॉलोनी, मधुबनी, बिहार   
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