श्री बमबहादुर लाल वर्मा के बारे में

सारामोहनपुर, दरभंगा, बिहार, निवासी श्री बम बहादुर लाल वर्मा के पांच पुत्र — श्री देव वंश नारायण बरिआर, श्री चन्द्रवंश नारायण सिन्हा, श्री बदरी नारायण सिन्हा, श्री सच्चिदानंद सिन्हा एवं श्री अरुण कुमार सिन्हा–एवं दो पुत्रियाँ, श्रीमती कृष्णा सहाय और श्रीमती शैलबाला सिन्हा . पुत्र श्री बदरी नारायण सिन्हा द्वारा अपने पिता के बारे में लिखित एवं ‘नवराष्ट्र’ दैनिक,  पटना (संस्थापक स्वर्गीय श्री देवव्रत शास्त्री) में वर्ष १९६५, मंगलवार, २ मार्च ( फाल्गुन कृष्णा पक्ष १४ संवत २०२१ ) में ‘नोटबुक के पन्ने’ श्रृंखला के अंतर्गत प्रकाशित इस सारगर्भित लेख–‘एक साधारण पुरुष की असाधारण जीवन-कथा’– का यहाँ पुनः प्रकाशन किया जा रहा है, जिसे श्री सच्चिदानंद सिन्हाजी ने उपलब्ध कराया है. इस लेख का अंग्रेजी अनुवाद आप इसी पोर्टल पर पढ़ सकते हैं. पढने के लिए क्लिक करें यहाँ (to read the English version of this post, please click here): https://akscentre.wordpress.com/2013/09/25/about-shri-bam-bahadur-lal-verma-father-of-aks/ –AKSCENTRE    

एक साधारण पुरुष की असाधारण जीवन-कथा

श्री बदरी नारायण सिन्हा

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श्री बदरी नारायण सिन्हा

न पद से अलंकृत, न ऐश्वर्य से विभूषित, अतएव, न राष्ट्रीय अथवा प्रांतीय ख्याति से ही सर्वविदित, परन्तु मानव के वांछनीय गुणों से परिपूर्ण, परिवार और अपने ग्राम के हित में रत, सदैव कार्यरत, शिक्षा के महातम्य को अपने अत्मजों और सखाओं के बीच स्थापित करने में किर्याशील, ऐसे देश के अनेक अप्रकाशित सपूतों में एक थे, स्वर्गीय श्री बम बहादुर लाल वर्मा, ग्राम सारामोहनपुर, जिला दरभंगा. सन् १८९५ ई. में इनका जन्म एक सुखी संपन्न परिवार में हुआ. बाल्यावस्था में माता के निधन हो जाने से इनका पालन-पोषण इनके पिता द्वारा हुआ. उस समय ज़मींदारों और उनके संरक्षक अंगेजों की तूती बोलती थी और पिता मुलाह्जिम दरभंगा राज के हुए, सत्ता का रसास्वादन करने के हेतु ही, यद्दपि स्वयं ही प्रतिष्ठित काश्तकार थे.

उर्दू का बोलबाला था, इसीलिए मौलिवियों से विद्यारम्भ कर इन्होने दरभंगा के सबसे उच्च विद्यालय की शिक्षा ली. परन्तु जीवन में सुख तीस वर्ष तक ही अनुभव कर सके, पिता का देहांत हो गया, एकमात्र भाई एवं अग्रज ने पदत्याग कर दिया, पिता की दानशीलता और परोपकार्जन्य उलझनों के कारण संपत्ति का बहुत बड़ा अंश जाता रहा और समूचे परिवार का पोषण करना इनका उत्तरदायित्व हो गया. आरम्भ में ही नयी जगहों, नए-नए लोगों से संपर्क स्थापित करने के मोह-जाल ने इन्हें बिहार के दूरस्थ स्थानों, उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों और यहाँ तक कि नेपाल के क्षेत्रों की ओर खींचा, जहाँ इन्होने अपने जीवन की दो सतत प्रवृत्यों को कार्यान्वित किया. स्वतंत्र प्रकृति के होने के नाते इन्होने दरभंगा राज की सेवा त्याग दी और जीवन-संग्राम में कूद पड़े. हाँ, आजीवन इनका जीवन संग्राममय ही रहा, पर आंधी और तूफ़ान में भी इन्होने अपने पथ से मुहं नहीं मोड़ा.
गाँधी युग में फले-फुले, पर उसके मर्म को ही अपनाया, न क्रांति में भाग लिया, न खद्दर पहनी. इनकी फुआ उस समय की कांग्रेस कार्यकर्ती रहीं. खद्दर पहनती थीं, सूत काटती थीं, गाँधी जी के साथ भ्रमण करती थीं. इनके पास अपने गाँव, जहाँ गांधीजी पधारे थे, से आकर रहती थीं. परन्तु इन्होनें आन्दोलन में सक्रिय भाग नहीं लिया. फिर भी, उस प्रभावशाली युग की धाराएँ इन्हें छूतीं कैसे नहीं? समाज की उन्नति करने की लौ को गांधीजी ने जलाई, इन्हें भी छू चुकी थीं; फलस्वरूप अछूत्तोधार, कट्टरपन का त्याग, शिक्षा का प्रसार जैसे उद्देश्यों का इन्होने बीड़ा उठाया. क्षेत्र चुना अपना परिवार और अपना ग्राम. परिवार तो सभी चुनते हैं, इसमे कोई विशेषता नहीं, परन्तु जब ऐसे समय को लें जब उच्चतर शिक्षा का अवसर न हो, थोड़ी-सी विद्या से ही सरकारी सेवा सुलभ हो और दंभ आ जाए, तब देश की ऊँचीं से ऊँचीं शिक्षा दिलाने में तत्परता दिखलाना सहज नहीं था, एक ऐसा ध्येय था, जिसके लिए त्याग और यातना का सहन अपेक्षित था. अपनी इस अडिग प्रेरणा को सफल करने में इन्होनें बहुत-सी यातनाएं सहीं, पर जिसका मीठा परिणाम आपने अपनी आँखों देखा जब अपने परिवार में पांच एम.ए व्यक्ति हो चुके थे.

जब अछूत्तोधार की लहर फैली, इन्होने अपने जलाशय पर मोची, निम्नवर्गीय मुसलमान, और अन्य पद-दलित वर्गों को सहर्ष तथा समाज की विडम्बना का डर त्याग कर आमंत्रित किया और उनके पेयजल की समस्या सुलझा दी. यही नहीं, ग्राम में शिक्षितों की संख्या न के बराबर थी, केवल कुछ समृदिध्शाली परिवारों ने थोड़ी-सी शिक्षा प्राप्त की थी. शिक्षा के असाधारण प्रेम ने इन्हें अपने द्वार पर पाठशाला खोलने को विवश किया और इसके गुरु स्वयं बने. अकेले निःशुल्क, पर बड़े प्रेम से, परिवारों की सुविधा के अनुसार, मोचियों, मुसलमानों, दुसाधों, ब्राहमणों, अहिरों के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया. जिले के मुख्यालय में स्तिथ सभी प्राधयापकों से मित्रता की, गाँव से विद्यालयों तक की दौड़ रखी, शुल्क माफ कराये, इनके कुटुम्बों से शिक्षा चलती रहने की प्रार्थना करते रहे, जिसका परिणाम यह हुआ कि प्रायः सभी वर्ग में आज स्कूल, कॉलेज की ऊँची से ऊँची शिक्षा प्राप्त किये हुए स्नातक हैं.

यह उनकी बड़ी देन है और सन १९६२ ई . में उनकी मृत्यु के पश्चात इस अगुवानी का स्थान रिक्त ही है. सरकार की सराहना पर या पैसे के प्रयास से तो शिक्षा का प्रसार सम्भव है. पर स्वतः शिक्षा का ध्वज फहराना, वह भी अपनी ही राशि, ज्ञान, एवं द्रव्य दोनों के सहारे देश के इने-गिने सपूतों और सेवकों का ही कार्य है. स्त्री शिक्षा का भी इन्होने समर्थन किया, परन्तु सुविधाऐं न होने के कारण इसे ग्राम में विकसित न कर सके. परन्तु जब अवसर आया, इन्होने हामी भरी, पटना विश्वविदालय की एम.ए पुत्र-वधु लाकर.
अपनी दूसरी प्रकृति का प्रतिपादन उन्होंने होमियोपैथी पढ़कर और व्यवहार में लाकर किया; रेल, सड़क की सुविधाओं से वंचित स्थानों में अपने मुख्यालय रख कर. सूझ मौलिक थी, पाश्चात्य चिकित्सा के बड़े-बड़े मर्मज्ञ भी इनकी पहचान की क़द्र करते थे. पैदल चलकर या साइकिल की सवारी कर, कोसों दूर, संक्रामक रोगों का निदान करना, जीवन का परम लक्ष्य रहा.

समाज की रूढिग्रस्त अवस्था से इन्हें निराशा थीं. इनका व्यक्तिगत माधुर्य, हास्य-रस से परिपूर्ण था. ७० वर्ष की अवस्था तक गाँव के रंगमंच पर उतरते रहे जब इनके पौत्र तक इनके सह्पात्र हुआ करते. यह इनकी जिन्दादिली ही थी. हास्य भूमिकाओं में इनकी विशेष रूचि थी. गाँव की पार्टीबंदी से सदैव अलग रहे और इन्होने किसी भी अराजकता में योगदान नहीं दिया. अपने अग्रज की सभी खामियों को प्यार से सहा, अपना सुख निछावर किया और परिवार में सदैव एक जागरूक प्रहरी की तरह रहे. इनका रूप सभी पहलुयों में निखरा, पिता, भाई, समाज-सुधारक, शिक्षा-प्रचारक, सेवा सुश्रूषादायक, जो भी ले लें, इन्होने असाधारण क्षमता दिखलाई. अब तो इनके अथक प्रयास से इनका गाँव या परिवार जिले के इने-गिने आई.ए, मैट्रिक, और सरकारी सेवा की ऊँची और सबसे ऊँची श्रृंखला, आई.ए.एस., आई.पी.एस के सदस्य हैं. हम ऐसे व्यक्ित्व की असाधारण क्षमता पर अपना मस्तक नवाते हैं.
श्री बदरी नारायण सिन्हा (४ अप्रैल १९३०-७ नवम्बर १९७९) भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ पदाधिकारी एवं हिंदी-अंग्रेजी के प्रतिष्ठित कवि-समालोचक थे. श्री सिन्हा के बारे में विस्तृत रूप से जानने के लिए कृपया इनके ऊपर उपलब्ध विकिपीडिया के इस पेज पर जाएँ http://en.wikipedia.org/wiki/Badri_Narain_Sinha अथवा इनपर केंद्रित इस पोर्टल पर जाएँ  http://bnsinhaips.org/

 

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